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'द ब्रदरहुड' के बुजुर्गों वकीलों ने सेंसर बोर्ड को हराया मुकदमा, मिला वीयू सर्टिफिकेट

Tricity Today Correspondent

Delhi: अच्छे-अच्छे दिग्गज फ़िल्म डायरेक्टरों को पानी पिलाने वाले फ़िल्म सेंसर बोर्ड को गांव के बेहद कम पढ़े-लिखे बुजुर्गों ने मुकदमा हरा दिया। दिल्ली फ़िल्म अपीलेट ट्रिब्यूनल में यह मुकदमा सेंसर बोर्ड और आने वाली डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'द ब्रदरहुड' के निर्देशक पंकज पाराशर के बीच था।

दरअसल, 'द ब्रदरहुड' दादरी के बिसाहड़ा कांड और ग्रेटर नोएडा के दो गांवों घोड़ी-बछेड़ा व तिलबेगमपुर के रिश्तों पर आधारित है। 'द ब्रदरहुड' का उद्देश्य दो प्रमुख सम्प्रदायों हिन्दू और मुसलमान के बीच एकता और सौहार्द्र कायम करने का प्रशंसनीय प्रयास है।

पंकज पाराशर ने बताया, फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने 'द ब्रदरहुड' में तीन कट लगाने का आदेश दिया था। ये कट लगाने के पीछे बोर्ड का तर्क बड़ा अटपटा था। बोर्ड का कहना था कि हिन्दू और मुसलमानों के गोत्र एक नहीं हो सकते हैं। डॉक्यूमेंट्री में दिखाई गई बातों से साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ सकता है। यह हास्यास्पद था, क्योंकि 'द ब्रदरहुड' हिन्दू-मुस्लिम एकता को दिखाने वाली फिल्म है। जिसमें घोड़ी बछेड़ा और तिल बेगमपुर गांवों के 500 साल पुराने रिश्ते दिखाए गए हैं कि किस तरह एक हिन्दू गांव मुस्लिम गांव को अपना बड़ा भाई मानता है।

पंकज पाराशर का कहना है कि घोड़ी बछेड़ा गांव में भाटी गोत्र के हिन्दू ठाकुर हैं और तिलबेगमपुर गांव में भाटी मुसलमान हैं। मुगलकाल के दौरान घटित एक घटना के कारण ऐसा हुआ। इसी तरह ग्रेटर नोएडा के एक गांव खेरली भाव में मस्जिद की नींव वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रखी गई थी। फ़िल्म में इस घटना को भी प्रदर्शित किया गया है। लेकिन सेंसर बोर्ड इसे भी गलत मान रहा था, बोर्ड के इस आदेश को पंकज पाराशर ने फ़िल्म अपीलेट ट्रिब्यूनल में चुनौती दी लेकिन वह महंगे वकील खड़े नहीं कर सकते थे।

उन्होंने बताया, 'मैंने दिल्ली में कई वकीलों से सम्पर्क किया, वकीलों ने यह मुकदमा लड़ने के लिए 5-5 लाख रुपए फीस मांगी। ट्रिब्यूनल में फ़िल्म निर्माता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील खड़े करते हैं। जो मुम्बई से आने वाले फ़िल्म निर्माताओं से मोटी फीस लेते हैं। उन्हें लगा कि हम भी बड़ी फीस देंगे। 3 लाख रुपये से कम में मुकदमा लड़ने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। मैंने अपनी समस्या गांव के बुजुर्गों को बताई।'

कुछ समय बाद पंकज पाराशर के गांव के दो बुजुर्गों मोअज्जम खान और मेघराज सिंह ने कहा कि हम खुद पैरवी करेंगे। हम तो हमारे हिन्दू और मुसलमान बुजुर्गों की जीती जगती सन्तानें हैं। फ़िल्म के तथ्यों को साबित करने के लिए इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है। आप वकील की जगह हमें पैरवी करने की ट्रिब्यूनल से इजाजत ले लीजिए। ट्रिब्यूनल ने हमें इजाजत दे दी। दोनों ग्रामीण बुजुर्गों ने जस्टिस मनमोहन सरीन, फ़िल्म अभिनेत्री पूनम ढिल्लों और शाज़िया इल्मी की बैंच के सामने सेंसर बोर्ड को निरुत्तर कर दिया। ट्रिब्यूनल ने बोर्ड की सारी आपत्तियों को खारिज कर दिया। फ़िल्म को वीयू सर्टिफिकेट दिया है। फ़िल्म के विषय की ट्रिब्यूनल ने प्रशंसा भी की है। 

ट्रिब्यूनल ने कहा, यह फ़िल्म देश में दो प्रमुख सम्प्रदायों हिन्दू और मुसलमान के बीच एकता और सौहार्द्र कायम करने का प्रशंसनीय प्रयास है।