Farmers Protests: सरकार और किसान संगठनों के बीच नौवें दौर की बातचीत बेनतीजा रही, 19 जनवरी को 10वें दौर की वार्ता होगी

सरकार और किसान संगठनों के बीच नौवें दौर की बातचीत बेनतीजा रही, 19 जनवरी को 10वें दौर की वार्ता होगी

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किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच शुक्रवार को हुई नौवें दौर की वार्ता भी विफल रही। सरकार से बातचीत के दौरान किसान संगठन नए तीनों कृषि सुधार कानून को निरस्त करने की मांग पर अड़े रहे, जबकि सरकार इन कानूनों में संशोधन की दुहाई देती रही। इस तरह नौवें दौर की वार्ता में भी कोई हल नहीं निकल सका। हालांकि दोनों पक्षों ने सहमति से अगली बैठक 19 जनवरी को करने का फैसला लिया। अब 19 जनवरी को सरकार और किसान संगठनों के बीच 10वें दौर की बातचीत होगी। बताते चलें कि शुक्रवार को तीन केंद्रीय मंत्रियों और करीब 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत दिल्ली के विज्ञान भवन में संपन्न हुई थी। उम्मीद थी कि शुक्रवार को ज्यादातर मसले हल कर लिए जाएंगे। पर ऐसा नहीं हो सका।

किसान नेता जोगिन्दर सिंह उग्रहान ने बैठक के बाद मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि किसान संगठनों ने सरकार से तीनों कानूनों को रद्द करने का आग्रह किया, पर केंद्र सिर्फ संशोधन की बात दुहराती रही। उन्होंने कहा, '' हमने 19 जनवरी को दोपहर 12 बजे फिर से मिलने का फैसला किया है ।“ उग्रहान ने कहा कि बैठक के दौरान किसान संगठनों के नेताओं ने पंजाब के उन ट्रांसपोर्टरों पर एनआई के छापे का मुद्दा उठाया, जो किसान विरोध प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं। भोजनावकाश सहित करीब पांच घंटे तक चली बैठक में किसान संगठनों ने कहा कि वे तीन कृषि कानूनों को लेकर जारी गतिरोध को दूर करने के लिये सीधी वार्ता जारी रखेंगे। 

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रेलवे, वाणिज्य एवं खाद्य मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्य मंत्री तथा पंजाब से सांसद सोम प्रकाश ने करीब 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ विज्ञान भवन में नौवें दौर की वार्ता की। बैठक में हिस्सा लेने वाली अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की सदस्य कविता कुरूंगटी ने कहा, ''सरकार और किसान संगठनों ने सीधी वार्ता की प्रक्रिया जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। इससे पहले 11 जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों के कार्यान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने इस मामले में गतिरोध को समाप्त करने के लिये चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। हालांकि, समिति के सदस्य और भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिन्दर सिंह मान ने खुद को समिति से अलग कर लिया है।
 
पंजाब किसान मोर्चा के बलजीत सिंह बाली ने कहा, ''अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में तोमर जी ने किसानों पर सरकार को बदनाम करने का आरोप लगाया। किसान कह रहे हैं कि सरकार अड़ी है और इसे प्रतिष्ठा का सवाल बनाये हुए है, जबकि सरकार ने आपकी कई मांगों को स्वीकार कर लिया है । क्या आप नहीं समझते कि आपको लचीला होना चाहिए और केवल कानून को रद्द करने की मांग पर अड़े नहीं रहना चाहिए।“  किसान नेता दर्शन पाल ने कहा, ''तीनों कानूनों के बारे में अच्छी चर्चा हुई। कुछ समाधान निकलने की संभावना है। हम सकारात्मक हैं। एक अन्य किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा, ''सरकार ने हमसे कहा कि समाधान बातचीत से निकाला जाना चाहिए, अदालत में नहीं। सभी का मानना है कि हम समाधान निकाल लेंगे ।  
     
इससे पहले, आठ जनवरी को हुई बातचीत बेनतीजा रही थी। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हजारों की संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं पर पिछले करीब दो महीने से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आठ जनवरी की बैठक में कोई नतीजा नहीं निकल सका था, क्योंकि केंद्र सरकार ने तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग को खारिज कर दिया था। सरकार का दावा है कि इन सुधारों को देशव्यापी समर्थन हासिल है। जबकि किसान नेता कानून निरस्त कराए बिना दिल्ली की सीमाओं से वापस नहीं जाने पर अड़े हैं। इस मामले में राय देने के लिए उच्चतम न्यायालय ने चार सदस्यीय समिति का गठने किया था। समिति के तीन सदस्यों में शेतकारी संगठन महाराष्ट्र के अध्यक्ष अनिल घनावत, इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी शामिल हैं। किसान संगठनों और केंद्र के बीच 30 दिसंबर को छठे दौर की वार्ता में किसानों की दो मांगों को सरकार ने मान लिया था। सरकरा ने पराली जलाने को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और बिजली पर सब्सिडी जारी रखने को अपनी रजामंदी दी थी।

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