SPECIAL REPORT: गौतमबुद्ध नगर में एक बार फिर बड़े किसान आंदोलन की आहट, क्या हैं वजह

Updated Feb 14, 2020 18:35:41 IST | Mayank Tawer

पिछले एक-डेढ़ दशक के दौरान देश में हुए सबसे बड़े किसान आंदोलन गौतमबुद्ध नगर ने ही देखे हैं। इनमें 13 अगस्त 2008 को ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण क्षेत्र के घोड़ी बछेड़ा गांव के किसानों के साथ हुआ खूनी संघर्ष सबसे बड़ा था। सात किसान पुलिस के गोली से मारे गए थे। इसके बाद यमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में भट्टा पारसौल का किसान आंदोलन तो पूरी दुनिया की सुर्खियों में आ गया था। यह आंदोलन 7 मई 2011 को को हिसंक हो गया था। दो किसानों और दो पुलिस वालों की जान चली गई थीं। ये आंदोलन विपक्ष में बैठी राजनीतिक पार्टियों के लिए फायदेमंद रहे तो सत्तासीन दलों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। अब करीब आठ-नौ साल बाद एक बार फिर गौतमबुद्ध नगर में बड़े किसान आंदोलन की आहट सुनवाई पड़ रही है। इसकी कुछ प्रमुख वजह हैं।

Photo Credit:  Tricity Today
प्रतीकात्मक फोटो
Key Highlights
सबसे बड़ी वजह किसान हितों के मुद्दों पर काम नहीं होना है। घोड़ी बछेड़ा और भट्टा पारसौल के किसान आंदोलनों के बाद व्यापक स्तर पर किसानों की समस्याओं पर काम किया गया था।
जब घोड़ी बछेड़ा और भट्टा पारसौल के किसान आंदोलन हुए थे तो प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी। जनप्रतिनिधि किसानों की नब्ज टटोलने में नाकामयाब रहे थे।
किसानों से हुए विवादों का बुरा असर शहर की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। प्रोपर्टी बाजार धड़ाम है। कोई ग्रेटर नोएडा में घर खरीदने के लिए तैयार नहीं है।
नोएडा में सरफाबाद और आसपास के गांवों के किसान आबादी निस्तारण और बढ़ा मुआवजा मांगने के लिए दो वर्षों से बार-बार प्राधिकरण पर धरना दे रहे हैं।

पिछले एक-डेढ़ दशक के दौरान देश में हुए सबसे बड़े किसान आंदोलन गौतमबुद्ध नगर ने ही देखे हैं। इनमें 13 अगस्त 2008 को ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण क्षेत्र के घोड़ी बछेड़ा गांव के किसानों के साथ हुआ खूनी संघर्ष सबसे बड़ा था। सात किसान पुलिस के गोली से मारे गए थे। इसके बाद यमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में भट्टा पारसौल का किसान आंदोलन तो पूरी दुनिया की सुर्खियों में आ गया था। यह आंदोलन 7 मई 2011 को को हिसंक हो गया था। दो किसानों और दो पुलिस वालों की जान चली गई थीं। ये आंदोलन विपक्ष में बैठी राजनीतिक पार्टियों के लिए फायदेमंद रहे तो सत्तासीन दलों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। अब करीब आठ-नौ साल बाद एक बार फिर गौतमबुद्ध नगर में बड़े किसान आंदोलन की आहट सुनवाई पड़ रही है। इसकी कुछ प्रमुख वजह हैं।

सबसे बड़ी वजह किसान हितों के मुद्दों पर काम नहीं होना है। घोड़ी बछेड़ा और भट्टा पारसौल के किसान आंदोलनों के बाद व्यापक स्तर पर किसानों की समस्याओं पर काम किया गया था। किसानों से हुए भूमि अधिग्रहण के बदले मुआवजा दरें गुणात्मक रूप से बढ़ाई गई थीं। आबादी से जुड़े मामलों में तेजी से निस्तारण किया गया था। हालांकि, आबादी निस्तारण की आड़ में घोटाला भी हुआ। लेकिन काफी हद तक किसानों की दिक्कतों को दूर किया गया। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार आई और किसानों से जुड़े मामलों की सुनवाई धीरे-धीरे धीमी पड़ती गई। दरअसल, सपा सरकार के मंत्री और अफसर इन परेशानियों के लिए पूर्ववर्ती बसपा सरकार को जिम्मेदार ठहराते थे।

नोएडा के छपरौली मांगरौली गांव के पूर्व प्रधान और किसान नेता चमन सिंह चौहान का कहना है कि सरकार कोई भी आए लेकिन प्राधिकरण में तैनात होने वाले अधिकारियों का रवैया एक जैसा ही रहता है। प्राधिकरण तानाशाही, मनमानी और भ्रष्टाचार के अड्डे बने हुए हैं। प्राधिकरणों में कामकाज जैसे सपा और बसपा की सरकारों के समय चल रहा था, वैसे ही भारतीय जनता पार्टी की सरकार के कार्यकाल में चल रहा है। चमन सिंह कहते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 अक्तूबर 2011 को फैसला सुनाया था। वह किसान हितों में ऐतिहासिक फैसला था। किसानों को 64.7 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा और 10 प्रतिशत भूमि विकसित करके देने का आदेश अदालत ने दिया था। प्राधिकरणों के अधिकारियों ने पैसा देने वालों और अपने लोगों को आनन-फानन में दोनों लाभ दिए। किसानों को देने से इंकार कर रहे हैं। अब तो मौजूदा सरकार ने ही इस पर पाबंदी लगा दी है।

चमन सिंह आगे कहते हैं कि हमारे गांव के लोगों ने आबादी निस्तारण और बढ़ा हुआ मुआवजा लेने के लिए करीब छह महीने लंबा धरना दिया। कोई हमारी बात सुनने नहीं आया। जब लोकसभा चुनाव आने में कुछ दिन बचे तो हमें झूठे वादे दे दिए गए। चुनाव बीतने के बाद सब ज्यों का त्यों हो गया है। चमन सिंह कहते हैं कि यूपी में भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार से बड़ी उम्मीद थी। सरकार ने प्राधिकरण में नियुक्ति से लेकर अब तक तैनात अधिकारियों का तबादला करने के लिए नई नीति बनाई। कुछ अधिकारियों के तबादले किए गए लेकिन कुछ दिन बाद सारे वापस लौट आए। दरअसल, ये सारे पूर्व मंत्रियों, विधायकों, सांसदों और पार्टी नेताओं के भाई, भतीजे, दामाद और रिश्तेदार हैं। जो पहले समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी या कांग्रेस में थे, अब भाजपा में आ गए हैं। वही लोग अब भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं के साथ घूम रहे हैं। भाजपा की प्रदेश और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए हैं।

चमन सिंह नोएडा में किसानों की गिरफ्तारी को नाजायज करार देते हैं। उन्होंने बताया कि सारे किसान संगठन एक हो रहे हैं। बैठक चल रही हैं। अगर प्राधिकरण ने किसानों को रिहा नहीं करवाया, तानाशाही बंद नहीं की और हमारी लंबित समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं किया तो मजबूर होकर किसानों को बड़ा आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा।

नोएडा में सरफाबाद और आसपास के गांवों के किसान आबादी निस्तारण और बढ़ा मुआवजा मांगने के लिए दो वर्षों से बार-बार प्राधिकरण पर धरना दे रहे हैं। गांव के किसान नेता सुखवीर सिंह पहलवान के नेतृत्व में दो महीने पहले धरना दिया गया था। तब प्राधिकरण के अधिकारियों ने जल्दी समस्या का समाधान करने का आश्वासन दिया और फिर भूल गए। अब सोमवार को एक बार फिर सैंकड़ों किसान प्राधिकरण के बाहर जाकर धरने पर बैठ गए। मंगलवार को प्राधिकरण की ओर से किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई गई और बुधवार को पुलिस ने सारे किसानों को हिरासत में ले लिया। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं। सुखवीर सिंह समेत 11 किसान नेताओं को जेल भेज दिया गया।

सुखवीर सिंह के सहयोगी रवि यादव ने कहा, किसानों को केवल झूठे आश्वासन मिलते हैं। जब शांतिपूर्वक लोकतांत्रिक अधिकार के तहत हम अपना हम मांगते हैं तो जेल भेज दिया जाता है। हम नोएडा प्राधिकरण के सामने धरने पर बैठे हैं। हमने सबसे पहले हमारे 11 लोगों को बिना शर्त रिहा करने की मांग की है। अगर किसानों को रिहा नहीं किया गया तो किसान जेल भरो आंदोलन शुरू करेंगे। हम रोजाना गिरफ्तारी देंगे। प्राधिकरण की मुख्य कार्यपालक अधिकारी का एक बयान आया था। उन्होंने कहा कि प्राधिकरण प्रत्येक मंगलवार को किसानों की सुनवाई करता है। यह सब झूठ है। हम न जाने कितनी बार एप्लीकेशन दे चुके हैं। लेकिन आज तक किसी एप्लीकेशन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

रवि का कहना है कि अगर हमारे किसान नहीं छोड़े गए तो हम रोजाना 40-50 किसान गिरफ्तारी देंगे। हमारा आंदोलन और उग्र होगा। शहर में अराजकता के लिए प्राधिकरण जिम्मेदार है। नोएडा के अधिकारियों ने सांठगांठ करके पैसा लेकर अपनी जमीनों पर अवैध अतिक्रमण करवाया है। दूसरी ओर जिन जगहों पर किसान 50-60 वर्षों से रह रहे हैं, उन्हें तोड़ा जा रहा है। ऐसी आबादी हैं, जो नोएडा प्राधिकरण के जन्म से पुरानी हैं। गढ़ी चौखंडी गांव का इंटर कॉलेज 1961 में बना था। सामाजिक संस्था उस कॉलेज को संचालित कर रही है। सरकार से वित्त पोषित संस्था है। उसकी जमीन का अधिग्रहण कर लिया है। वहां मौके पर कॉलेज चल रहा है और प्राधिकरण ने कागजातों में अपना कब्जा दिखा रहा है।

रवि का कहना है कि हम लोगों ने इसके खिलाफ लोकायुक्त में शिकायत की है। किसान को अतिक्रमणकारी बताया जा रहा है। सबसे बड़ा अतिक्रमणकारी तो नोएडा विकास प्राधिकरण है। प्राधिकरण ने गांवों में ग्राम सभा (एलएमसी) की सारी जमीन बिल्डरों को बेच दी हैं। पशुचर, खेल के मैदान, तालाब और बंजर-ऊसर भूमि पर जबरन कब्जा करके बिल्डरों को बेच दी हैं। नोएडा में धर्मपाल सतपाल कंपनी एलएमसी की ऐसी ही जमीन पर बनी है। कंपनी पर करोड़ों रुपये का जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना वूसल लिया गया लेकिन जमीन को खाली नहीं किया गया है।

किसानों से हुए विवादों का बुरा असर शहर की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। प्रोपर्टी बाजार धड़ाम है। कोई ग्रेटर नोएडा में घर खरीदने के लिए तैयार नहीं है। इसमें ग्रेटर नोएडा वेस्ट में किसानों से हुए विवाद और आंदोलन सबसे बड़ी वजह रहे हैं। सुपरटेक और आम्रपाली जैसे बिल्डर इन आंदोलनों के भेंट चढ़ गए। करीब दो लाख फ्लैट खरीदार मारे-मारे घूम रहे हैं। ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण पर 7,000 करोड़ रुपये का कर्ज है। देश का सबसे सुंदर शहर आज बदहाली के आंसू रो रहा है। ग्रेटर नोएडा वेस्ट में आंदोलन की कमान संभालने वाले किसान संघर्ष समिति के प्रवक्ता मनवीर भाटी का कहना है कि अगर यमुना प्राधिकरण के सीईओ डा. अरुणवीर सिंह को छोड़ दें तो नोएडा और ग्रेटर नोएडा के प्राधिकरणों में इस वक्त तानाशाह अफसर तैनात हैं।

मनवीर का कहना है कि कोई किसानों से मिलना नहीं चाहता है। लाठी के बूते शहर चलाने की नीयत है। ठीक ऐसा ही हाल बसपा सरकार के कार्यकाल में देखने के लिए मिला था। किसान हक मांगते थे तो लाठी मिलती थी। जेल में डाल दिया जाता था। अब फिर वही रवैया चल रहा है। अधिकारी हम लोगों को जाहिल और गंवार समझते हैं। उन्हें नहीं मालूम होगा कि इस जिले के किसान नेता पॉलीटिकल साइंस में एमए और पीएचडी हैं। वह प्राधिकरण में पहली या दूसरी बार तैनात हुए हैं, हम लोग यहां दशकों से सबकुछ झेल रहे हैं। जिले के जनप्रतिनिधियों का हाल भी बसपा सरकार जैसा ही हो गया है। मुख्यमंत्री तक बात नहीं पहुंचा सकते हैं। सांसद-विधायक का जिले के अधिकारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में जनता क्या करेगी? आंदोलन ही एकमात्र रास्ता बचता है।

जब घोड़ी बछेड़ा और भट्टा पारसौल के किसान आंदोलन हुए थे तो प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी। जिले में सांसद और दोनों विधायक भी बहुजन समाज पार्टी के थे। उसके बावजूद जनप्रतिनिधि किसानों की नब्ज टटोलने में नाकामयाब रहे थे। दरअसल, किसानों को तत्कालीन सरकार ने अपने खिलाफ और विपक्ष का मोहरा मान लिया था। घोड़ी बछेड़ा के किसानों पर हुई फायरिंग के बाद उस समय की मुख्यमंत्री मायावती ने 24 अगस्त 2008 को बयान दिया था कि इस सबके पीछे मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी का हाथ है। अभी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। सांसद और तीनों विधायक भाजपा के हैं। किसान कह रहे हैं कि जनप्रतिनिधि उनकी ओर से आंख मूंदकर बैठे हैं। दरअसल, आजकल विधायक और सांसद अपनी सरकार के अधिकारियों की खराब नीतियों की आलोचना करने से भी डरते हैं।

दादरी में किसान हितों के लिए संघर्ष कर रहे सुनील फौजी ने कहा, सरकार और विकास प्राधिकरण किसानों का दमन करने पर आमादा हैं। प्राधिकरणों में बैठे अधिकारी किसान हितों पर काम करने की बजाय बिल्डरों के हितों में काम कर रहे हैं। प्राधिकरण के अधिकारी अपने हितों के लिए काम कर रहे हैं। हम लोग रविवार को बैठक करेंगे। जिसमें जिले के सभी 10-12 किसान संगठनों के पदाधिकारी शामिल होंगे। उस बैठक में आगे की रणनीति बनाई जाएगी। हमारी सबसे पहली मांग गिरफ्तार किए गए किसानों को छोड़ने की है। हम सारे किसान एक ज्ञापन मुख्यमंत्री के नाम भेजेंगे। सुनील फौजी ने कहा, सबसे दुखद बात यह है कि प्राधिकरण में बैठे अधिकारी तो किसानों के बारे में सोच ही नहीं रहे हैं, हमारे जनप्रतिनिधि और राजनीतिक पार्टियों के नेता भी किसान हितों की बात करने से डर रहे हैं। जब कोई किसानों की बात नहीं सुनेगा तो मजबूर होकर किसान क्या करेगा? फिर मरने के लिए सड़कों पर उतरेगा।

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जब भी बड़ी परियोजनाओं पर किसी सरकार ने काम शुरू किया, तब-तब बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ है। पहली बार जिले में जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए शांतिपूर्ण भूमि अधिग्रहण हुआ है। लेकिन, इसके बावजूद बड़ी संख्या में असंतुष्ट किसान हैं। जिन्हें अभी बाकी किसानों का समर्थन हासिल नहीं है। लेकिन, अगर नोएडा और ग्रेटर नोएडा में विकास प्राधिकरणों ने मनमाना रवैया अख्तयार किया तो किसानों की लामबंदी को बल मिलेगा। जिसका नुकसान अंतत: जेवर एयरपोर्ट जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना तक पहुंचना स्वाभाविक है।

किसान सभा के प्रवक्ता रुपेश वर्मा का कहना है कि हम लोग गुरुवार को जेल गए थे। नोएडा से गिरफ्तार किसानों से मुलाकात की। उसके बाद हम नोएडा प्राधिकरण के बाहर धरने पर बैठे किसानों से मिलने गए। उन्हें हमने समर्थन दिया है। अब हमारी कोर कमेटी रविवार को मीटिंग करेगी। अगर किसानों को रिहा नहीं किया गया और समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो जेल भरो आंदोलन किया जाएगा। जिले भर के किसान एक होंगे और आंदोलन करेंगे। रुपेश कहते हैं कि इस सरकार का आधा कार्यकाल खत्म हो चुका है। भ्रष्टाचार से लड़ने, बिल्डरों को दुरुस्त करने और फ्लैट खरीदार व किसान के हित में काम करने के सारे दावे हवा हवाई निकले हैं। अब यही सरकार बिल्डरों को जीरो पीरियड दे रही है। फ्लैट खरीदारों को धमकाया जा रहा है। किसानों को जेल भेजा जा रहा है। सही मायने में जो गलत काम पिछली सरकार करने से डरती थीं, वह सारे काम यह सरकार केबीनेट में पास कर रही है।

कुल मिलाकर किसान प्राधिकरण अधिकारियों की मनमानी, जिले के जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा और सरकार तक बात नहीं पहुंचने से आहत हैं। किसानों का कहना है कि इतना महत्वपूर्ण जिला होने के बावजूद कोई सुनने वाला नहीं है। सरकार के मंत्री जिले में आते हैं और अफसरों के साथ बैठक करके चले जाते हैं। किसानों से मिलने की उन्हें इच्छा नहीं होती है। दूसरी ओर जनप्रतिनिधि किसानों की समस्याओं को अपने लिए भूत समझते हैं। उन्हें लगता है किसानों की समस्याएं नहीं सुरसा का मुंह हैं, जिसका पेट भरने का नाम नहीं लेता है। अधिकारियों को लगता है कि किसानों को विरोध करने और ज्यादा से ज्यादा मांगने की आदत है। इन्हीं पूर्वाग्रहों और धारणाओं के बीच किसान उलझा है।