नोएडा में सड़क पर बच्चे की मौत का मामला, चार अस्पताल एक मासूम जान नहीं बचा सके, सीएमओ की शुरुआती जांच में बड़ा खुलासा

Updated May 27, 2020 08:22:27 IST | Tricity Reporter

उत्तर प्रदेश की शोविंडो और आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले गौतमबुद्ध नगर जिले के अस्पतालों की हालत क्या है...

नोएडा में सड़क पर बच्चे की मौत का मामला, चार अस्पताल एक मासूम जान नहीं बचा सके, सीएमओ की शुरुआती जांच में बड़ा खुलासा
Photo Credit:  Tricity Today
बच्चे के शव को बाइक पर लेकर लौटते राजकुमार और प्रेम कुमार

उत्तर प्रदेश की शोविंडो और आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले गौतमबुद्ध नगर जिले के अस्पतालों की हालत क्या है, इसकी पोल एक मासूम नवजात बच्चे की मौत ने खोलकर रख दी है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के बीच सड़कों पर दौड़ते माता-पिता के हाथों में मासूम बच्चे ने दम तोड़ दिया और 4 अस्पताल मिलकर एक मासूम जान बचाने में नाकामयाब रहे। गौतमबुद्ध नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी की ओर से जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति इस बात का खुलासा कर रही है।

नोएडा के सेक्टर-36 में रहने वाले राजकुमार और उनकी पत्नी रेखा का नवजात मासूम बच्चा स्वास्थ्य विभाग की अव्यवस्थाओं और प्राइवेट अस्पतालों के लालच की भेंट चढ़ गया। यह मामला सामने आने के बाद गौतमबुद्ध नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ दीपक ओहरी ने आनन-फानन में एक प्रेस बयान जारी किया है। जिसमें डॉ दीपक ओहरी ने पूरी घटना के बारे में जानकारी देने की कोशिश की है।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-36 सी ब्लॉक में रहने वाले राजकुमार की पत्नी रेखा को 25 मई को स्वर्ण नगरी के कृष्ण लाइफलाइन अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। रात में लगभग 9:30 बजे रेखा ने एक बच्चे को जन्म दिया। बच्चे की हालत ठीक नहीं थी। जिसके कारण कृष्णा लाइफलाइन अस्पताल ने बच्चे को रात 10:00 बजे सेक्टर डेल्टा वन के ग्रीन सिटी हॉस्पिटल रेफर कर दिया। परिजनों ने बच्चे को ग्रीन सिटी अस्पताल में भर्ती करवाया। करीब 2 घंटे पश्चात बच्चे को वेंटीलेटर पर रखा गया। जब बच्चे की हालत ज्यादा बिगड़ गई तो ग्रीन सिटी अस्पताल के डॉक्टरों ने किसी अन्य चिकित्सालय ले जाने की बात कही।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी का कहना है कि इस पूरे मामले में अस्पताल ने तीन बड़ी गलतियां की हैं। पहली, जब बच्चा वेंटिलेटेड था तो इसके बावजूद अस्पताल में एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई। दूसरी, बच्चे के साथ कोई स्वास्थ्य कर्मी सरकारी एम्बुलेंस में साथ नहीं भेजा गया। तीसरी गलती यह रही कि बच्चे को रेफर स्लिप भी नहीं दी गई थी। सीएमओ ने लिखा है कि राजकुमार ने 108 एंबुलेंस को कॉल करके बुलाया। सही रेफरल नहीं होने के कारण यह लोग पहले दादरी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बच्चे को लेकर गए। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर बाल रोग विशेषज्ञ नहीं था। जिसके कारण बच्चे को नोएडा के सुपरस्पेशलिटी बाल चिकित्सालय भेज दिया गया। 

सीएमओ के मुताबिक नोएडा के सुपर स्पेशलिटी चाइल्ड अस्पताल पहुंचने से पूर्व ही बच्चे की मौत हो गई। सीएमओ का कहना है कि इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ग्रीन सिटी अस्पताल को नोटिस भेजा गया है और इस मामले में कड़ी कार्यवाही की जाएगी। सीएमओ का कहना है कि पूरे मामले की जांच करने के लिए अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ संजीव मांगलिक और अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सुनील कुमार दोहरे की जांच समिति का गठन कर दिया गया है। 

प्राइवेट अस्पताल का लालच बच्चे की जान से ज्यादा बड़ा निकला

इस प्रारंभिक जांच पड़ताल से साफ हो जाता है कि परिजन बच्चे को लेकर जिले के चार अस्पतालों में धक्के खाते फिरे। जिनमें दो सरकारी और दो प्राइवेट अस्पताल शामिल हैं। लेकिन चारों अस्पताल मिलकर एक नवजात बच्चे की जान बचाने में नाकामयाब रहे। इस पूरे प्रकरण में दो बातों पर गौर करने की जरूरत है। प्राइवेट अस्पताल ने परिजनों का सहयोग करना और बच्चे की जान बचाना इसलिए मुनासिब नहीं समझा क्योंकि उनके पास पैसा नहीं था। 

बच्चे के पिता राजकुमार का कहना है की ग्रीन सिटी अस्पताल ने 25000 रुपये रोज के हिसाब से खर्च की मांग की थी। जब वह नहीं दे पाए तो अस्पताल प्रबंधन ने बच्चे को रेफर कर दिया। मतलब साफ है कि प्राइवेट अस्पताल के मैनेजमेंट का लालच एक मासूम बच्चे की जान पर भारी पड़ गया। अस्पताल को लगा कि इस बच्चे पर आने वाला खर्च परिवार वहन नहीं कर पाएगा। ऐसे में इससे इसे सरकारी अस्पताल भेजकर छुटकारा पा लेना ही मुनासिब होगा।

सरकारी सिस्टम के ढीलेपन के आगे हाईटेक जिला क्या है

दूसरी गौर करने वाली बात सरकारी व्यवस्था पर है। राजकुमार और उसका बड़ा भाई प्रेम कुमार रात 9:30 बजे से 1:30 बजे तक सरकारी एंबुलेंस बुलाने के लिए फोन करते रहे। प्रेम कुमार का कहना है यूपी 112 पर कॉल करने के बाद पुलिस आई और डेढ़ घंटे तक पुलिस भी सरकारी एंबुलेंस बनाने बुलाने के लिए कॉल करती रही। जब सरकारी एंबुलेंस पहुंची तो उसमें ऑक्सीजन तक का इंतजाम नहीं था। ऐसे में हाथ-पांव जोड़कर प्रेम कुमार और राजकुमार ने ग्रीन सिटी अस्पताल से मामूली मदद हासिल की। लेकिन बच्चे की जान बचाने के लिए यह सबकुछ पर्याप्त नहीं था। ग्रीन सिटी अस्पताल ने यह मार्गदर्शन करना भी ठीक नहीं समझा कि बच्चे को कहां लेकर जाना है। अनजान राजकुमार और प्रेम कुमार को एम्बुलैंस वाले बच्चे के साथ दादरी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर चले गए। जहां क्रिटिकल कंडीशन में बच्चे को उपचार मिलना तो बहुत बड़ी बात है वहां सामान्य प्रसव कराने की सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। 

कुल मिलाकर करीब 5 घंटे का वक्त इसी जद्दोजहद में निकल गया और बच्चे की जान चली गई। अब जांच, सवाल, दुख और पछतावा ही बाकी बचा है। हालांकि, इस बात की गुंजाइश तो नहीं के बराबर है कि आने वाले दिनों में भी हालात सुधरेंगे। क्योंकि ऐसी न जाने कितनी मौत सिस्टम की लापरवाही और लालच के कारण पहले भी होती रही हैं।

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