Mahatma Gandhi Jayanti: गांधी के बचपन के वो किस्से, जिनसे सीख लेकर मोहनदास से महात्मा बने गांधी जी

Mahatma Gandhi Jayanti: गांधी के बचपन के वो किस्से, जिनसे सीख लेकर मोहनदास से महात्मा बने गांधी जी

Google Image | Mahatma Gandhi Jayanti

Mahatma Gandhi Jayanti: सत्य और अहिंसा को अपना सबसे घातक हथियार बनाकर भारत की आजादी का बिगुल बजाने वाले महात्मा गांधी दुनिया के पटल पर सदैव अपनी चमक बिखेरते रहेंगे। कहा जाता है कि महात्मा गांधी की लाठी में जितनी ताकत थी, उतनी अंग्रेजी हुकूमत के तोपों में नहीं थी। महात्मा गांधी के चरखे ने हिंदुस्तान के आम जनजीवन में एक जोश, उमंग और आजादी की दीवानगी पैदा की। जिसकी बदौलत आज हम आजाद हिंदुस्तान में आजादी से सांस ले रहे हैं। महात्मा गांधी को लिखने-पढ़ने का बहुत शौक था। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में अपने जीवन से संबंधित तमाम बिदुंओं पर बेबाकी से लिखा है। इस आत्मकथा में उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष से जुड़ी अहम घटनाओं का भी जिक्र किया है।


महात्मा गांधी यानी मोहनदास करमचंद गांधी के दादा उत्तमचंद गांधी (ओटा गांधी) की दो शादियां हुई थीं। इससे उनके छह संतान हुए। गांधी के पिता करमचंद गांधी इन्हीं में से एक थे। करमचंद गांधी को प्यार से कबा गांधी कहा जाता था। करमचंद गांधी ने भी चार शादियां कीं। गांधी जी के पिता का पहला विवाह सिर्फ 14 साल की उम्र में हो गया था। इस विवाह से उनकी दो बेटियां हुई थीं। करमचंद गांधी जब 25 साल के थे तब उनकी पहली पत्नी गुजर गईं। फिर उन्होंने दूसरा विवाह किया । थोड़े दिनों में उन्हें पोरबंदर का दीवान बना दिया गया था। इससे पहले उनके पिताजी इस पद पर आसीन थे। दीवान बनने के बाद उनका तीसरा विवाह हुआ। फिर उन्होंने चौथी शादी की।


उनकी चौथी पत्नी का नाम पुतलीबाई था। विवाह के समय पुतलीबा की उम्र 13 से 14 वर्ष की थी। महात्मा गांधी पुतलीबाई के ही चार संतानों में सबसे छोटे थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि महात्मा गांधी के बचपन का नाम मुनिया था। उनकी मां उन्हें प्यार से मुनिया नाम से ही पुकारती थीं। महात्मा गांधी बचपन से ही बहुत कुशाग्र बुद्धि के थे। सत्य और अहिंसा के राह पर चलने की सीख उन्हें बचपन में ही मिल गई थी। आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में उन्होंने लिखा है कि बचपन की कुछ गलतियों ने किस तरह उनकी आत्मा को प्रभावित किया और उनके महात्मा बनने की नींव रखी। गलतियों के बिना बचपन का वजूद बहुत मुश्किल होगा। पर मोहनदास जैसे विरले ही अपनी गलतियों से सबक लेकर नई पहचान बना पाते हैं।


गांधी जी के बचपन से जुड़े कुछ किस्सों के बारे में जानते हैं –


मां पुतलीबाई को गहरी सीख दी थी


महात्मा गांधी के घर में एक कुआं था। इसके चारों ओर पेड़-पौधे थे। कुएं के चलते घर के बच्चों को पेड़ पर चढ़ने से मना किया जाता था। पर महात्मा गांधी को जब भी मौका मिलता, पेड़ पर चढ़ जाते। एक दिन उनके बड़े भाई ने उन्हें पेड़ पर देख लिया और उन्हें डांट कर नीचे बुलाने लगे। महात्मा गांधी नीचे नहीं उतरने की जिद कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उन्हें पेड़ पर मजा आ रहा है। बड़े भाई ने गुस्से में उन्हें एक चांटा मार दिया। मोहनदास रोते हुए अपनी मां पुतलीबा के पास गए और उनसे बड़े भाई को डांटने की जिद करने लगे। 


पुतलीबाई दूसरे कामों में व्यस्त थीं। तंग आकर उन्होंने महात्मा गांधी से कहा कि तेरे बड़े भाई ने तुझे मारा है, तू भी जाकर उसे मार ले। इस पर महात्मा गांधी ने अपने आंसू पोछते हुए कहा - मां आपने तो हमेशा बड़ों का आदर करना सिखाया है । भैया मुझसे बड़े हैं। मैं भैया पर हाथ कैसे उठा सकता हूं। पर आप हमारी मां हैं, हम दोनों को आपने जन्म दिया है। आप भैया को समझा सकती हैं। इतना सुनते ही पुतलीबा को अपनी भूल समझ में आई। उन्होंने मुनिया को गले लगा लिया और उन्हें आजीवन सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलते रहने के लिए कहा। किसे पता था कि पुतलीबा का मोनिया बड़ा होकर समूचे संसार को सत्य और अहिंसा का पुजारी बना देगा।


आम बच्चों की तरह नशे का शौक था


गांधीजी को बचपन में ही बीड़ी पीने का नशा हो गया था। बचपन के लिहाज से कहें तो उन्हें बीड़ी पीने का शौक हो गया था। उनके पास बीड़ी खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। इसलिए जब उनके काकाजी बीड़ी पीकर फेंक देते थे, तो गांधीजी अपने एक रिश्तेदार के साथ अकेले में बीड़ी के बचे हुए टुकड़े को पीया करते थे। हालांकि उन्हें जली हुई बीड़ी भी हर वक्त नहीं मिल पाती थी।


घर के नौकर की जेब से पैसे चुराते थे गांधी


मोहन दास को बीड़ी का शौक इस कदर लगा कि वो बिना बीड़ी के रह नहीं पाते थे। इसलिए वह अपने घर के नौकर की जेब से पैसे चुरा कर बीड़ी खरीदने लगे। इससे बीड़ी न मिलने की समस्या का निराकरण तो हो गया। पर इसके बाद की समस्या  पहले वाले से भी जटिल थी। अब उन्हें चोरी के पैसे से खरीदी हुई को छुपाने की जगह नहीं मिल पाती थी। देखते-देखते चोरी के पैसों से खरीदी हुई बीड़ी भी खत्म हो जाती थी। दूसरे बच्चों की तरह फिर उन्होंने डंठल के पौधे की बीड़ी बनाना शुरू कर दिया और इसे पीने लगे। हालांकि इससे वह संतुष्ट नहीं होते थे।

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