Gandhi Jayanti 2020: महात्मा गांधी के इन आंदोलनों ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं, अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े थे

Gandhi Jayanti 2020: महात्मा गांधी के इन आंदोलनों ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं, अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े थे

Google Image | Mahatma Gandhi Jayanti 2020

Mahatma Gandhi Jayanti: आधुनिक भारत के गुजरात में पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्टूबर 1869 को जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी ने जो मुकाम हासिल किया, वो विरले ही कर पाते हैं। मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी हिंदुस्तान की आजादी के सबसे लोकप्रिय किरदार थे। भारत को आजादी दिलाने के लिए उन्होंने सिर्फ सत्य और अहिंसा का सहारा लिया। यह किसे पता था कि एक विशाल जनसमूह उनके सत्य और अहिंसा के मार्ग को अपनाएगा और गांधी जी के आजाद भारत के सपने को नई उड़ान देगा।


महात्मा गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत से देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए सिर्फ अहिंसात्मक आंदोलनों को ही अपना हथियार बनाया। इन आंदोलनों ने अंग्रेजों को हिंदुस्तान छोड़ने के लिए विवश कर दिया। एक के बाद एक उन्होंने कई आंदोलन किए, जिनसे भारत की आजादी का मार्ग प्रशस्त हुआ। गांधीजी सन 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए थे। 26 जनवरी 1930 को उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत से भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का ऐलान किया था। 


एक नजर उनके आंदोलनों पर डालते हैं - 


चंपारण आंदोलन (1917)


चंपारण आंदोलन को महात्मा गांधी की अगुवाई वाला पहला आंदोलन माना जाता है। जब 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तब देश में अंग्रेजी अत्याचार अपने चरम पर था। अंग्रेज भारतीय किसानों को उनकी उपजाऊ जमीन पर नील और दूसरी नगदी फसलों की खेती के लिए मजबूर करते थे। फिर इन फसलों को सस्ते दामों पर खरीद लेते थे। मौसम की मार और ज्यादा कर की वजह से किसानों को गरीबी में जीवन यापन करना पड़ता था। 


किसानों की हालत बहुत दयनीय थी। चंपारण, बिहार में किसानों के साथ बहुत जुल्म हो रहा था। 15 अप्रैल 1917 को महात्मा गांधी चंपारण, मोतिहारी गए और यहीं सत्याग्रह की नींव रखी गई। नील की खेती के नाम पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा किसानों पर किए जा रहे जुल्म के खिलाफ गांधी ने 1917 में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया और उन्हें भारी समर्थन हासिल हुआ। दक्षिण अफ्रीका से वापस आने के बाद यह महात्मा गांधी का पहला आंदोलन था, जो पूरी तरह सफल रहा। 


खेड़ा आंदोलन (1918)


साल 1918 में गुजरात के खेड़ा में मौसम ने भारी तबाही मचाई थी। किसानों की पूरी फसले बर्बाद हो गई थीं। किसानों ने ब्रिटिश प्रशासन से करों को माफ करने की अपील की, जिसे अंग्रेजों की तरफ से ठूकरा दिया गया। इसके बाद किसानों पर अंग्रेजों का अत्याचार आरम्भ हो गया। किसानों का साथ देने के लिए गांधी जी और बल्लभभाई पटेल ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। यह संघर्ष लगातार पांच महीने तक चलता रहा। अंततोगत्वा ब्रिटिश शासन ने हालात सामान्य होने तक कर नहीं लेने का वादा किया।


खिलाफत आंदोलन (1919)


वर्ष 1919 में महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की।  इस आंदोलन का मकसद तुर्की में खलीफा के पद की पुनः स्थापना कराने के लिए ब्रिटिश हुकूमत पर दबाव डालना था। भारत में मुसलमान ब्रिटिश हुकूमत द्वारा तुर्की में किए जा रहे उलटफेर का विरोध कर रहे थे। हालांकि मौजूदा वक्त में खिलाफत आंदोलन की काफी आलोचना की जाती है। पर उस वक्त आजादी की लड़ाई में देश के मुसलमानों का सहयोग हासिल करने के लिए आंदोलन जरूरी था।


असहयोग आंदोलन (1920)


जलियांवाला बाग हत्याकांड से क्षुब्ध होकर 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन आरंभ किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने समूचे देश को असहनीय पीड़ा दिया। इस हादसे ने महात्मा गांधी की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। इससे गांधी को बहुत तकलीफ हुई और उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने का दृढ़ निश्चय किया। इस आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने स्वराज की परिकल्पना की और इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य लक्ष्य बना दिया।


असहयोग आंदोलन ने देश में नई उमंग फूंक दी। जल्दी ही ब्रिटिश हुकूमत द्वारा संचालित संस्थानों, स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार होना शुरू हो गया। हालांकि चौरीचौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की। चौरी चौरा उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के समीप स्थित है। भीड़ ने चौरीचौरा स्थित एक थाने में सभी पुलिसवालों को बंद कर आग लगा दी, जिसमें 23 पुलिसवालों की मौत हो गई थी।


सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)


सविनय अवज्ञा आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए उन आंदोलनों में से एक था, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। सन 1929 तक भारत के क्रांतिकारियों और अहिंसात्मक आंदोलन के नेताओं को ब्रिटिश इरादों की भनक लग गई थी। उन्हें ऐसा लगने लगा था कि ब्रिटेन भारत की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करेगा और इसे औपनिवेशिक स्वराज्य बनाए रखना चाहता है।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में एक महत्वपूर्ण फैसला लिया गया। इस अधिवेशन में ये सहमति बनी कि अब भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी जाएगी। पूर्ण स्वतंत्रता से कम कुछ स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस आंदोलन के दौरान नमक कानून का उल्लंघन कर महात्मा गांधी ने खुद नमक बनाया।


दांडी मार्च (1930)


महात्मा गांधी और उनके स्वंय सेवकों ने 12 मार्च 1930 को दांडी यात्रा आरंभ की। इसका असली मकसद अंग्रेजों द्वारा बनाए गए नमक कानून को तोड़ना था। गांधी जी ने 78 स्वयं सेवकों के साथ साबरमती आश्रम से 358 किलोमीटर दूर स्थित दांडी की यात्रा पैदल शुरू कर दी। करीब 24 दिन बाद 6 अप्रैल 1930 को महात्मा गांधी दांडी पहुंचे और उन्होंने समुद्र तट पर नमक कानूनों को तोड़ कर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी।

दलित आंदोलन (1932)


महात्मा गांधी सामाजिक बुराइयों से भी देश को आजादी दिलाना चाहते थे। उनका सपना रामराज्य स्थापित करने का था। जहां  हर नागरिक को सामान समझा जाए, किसी के साथ भेदभाव न हो और सामाजिक समरसता बनी रहे। इसी लिए साल 1932 में महात्मा गांधी ने अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना की। उन्होंने 8 मई 1933 को छुआछूत विरोधी आंदोलन की नींव रखी और इस आंदोलन को धार देने के लिए हरिजन नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया। आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने 21 दिन का उपवास रखा। आंदोलन का मकसद समाज से अस्पृश्यता को पूरी तरह मिटाना था। दलितों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग सबसे पहले गांधी जी ने हीं किया था। उनका मानना था कि हरिजन का मतलब ‘ईश्वर का रूप’ है।


भारत छोड़ो आंदोलन (1942)


भारत छोड़ो आंदोलन ब्रिटिश हुकूमत के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। इस आंदोलन ने अंग्रेजी शासन की ईंट से ईंट बजा दी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर 9 अगस्त 1942 को पूरे देश में एक साथ भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। ऐसा माना जाता है कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में जो दो सबसे महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं, उनमें भारत छोड़ो आंदोलन दूसरा था। इससे पहले 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बज चुका था। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की और आंदोलन भारत की आजादी का एलान होने तक देशवासियों में ऊर्जा का संचार करता रहा।

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