अगर कृष्ण-गांधी और गीता-कर्म को समझना है तो अनासक्ति आश्रम जरूर जाएं

उत्तराखंड की यात्रा : अगर कृष्ण-गांधी और गीता-कर्म को समझना है तो अनासक्ति आश्रम जरूर जाएं

अगर कृष्ण-गांधी और गीता-कर्म को समझना है तो अनासक्ति आश्रम जरूर जाएं

Tricity Today | उत्तराखंड की यात्रा

अगर कृष्ण-गांधी और गीता-कर्म को समझना है तो अनासक्ति आश्रम जरूर जाएं A visit to Uttrakhand : आज बापू का जन्मदिन है। मैं उत्तराखंड के अनासक्ति योग आश्रम में हूं। महात्मा गांधी ने मानव जीवन के प्रत्येक आयाम को छूआ है। सत्य, अहिंसा, धर्म, कर्म, आस्था और योग उनके जीवन के आधार हैं। लेकिन, आस्था और आसक्ति में फर्क भी बापू ने बखूबी समझाया है। बापू को पढ़ने वाले इस बात को जानते हैं। राष्ट्रपिता की गीता और कृष्ण में अगाध आस्था थी। यह तार्किक आस्था कर्म की व्याख्या करती है। कर्मफल के प्रति अनासक्ति को बढ़ावा देती है। मतलब, कर्मफल के प्रति आसक्ति या लालसा उचित नहीं है। यही बात गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदचनः के जरिए समझाई। बापू बेहद सरल अंदाज में यह बात "अनासक्ति योग" के जरिए समझा गए हैं।



सबसे पहले बात अनासक्ति योग आश्रम की
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का पहाड़ी शहर कौसानी महात्मा गांधी से जुड़े इस आश्रम के लिए पर्यटकों को उतना ही आकर्षित करता है, जितना 92 साल पहले महात्मा गांधी को इसने अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण आकर्षित किया था। वर्ष 1929 की गर्मियों में महात्मा गांधी ने कौसानी का दौरा किया था, जो उनकी सम्पूर्ण भारत यात्रा के दौरान दो दिवसीय ठहराव था। लेकिन हिमालय के मनमोहक दृश्य से वह इतने रोमांचित हुए कि उन्होंने अपने प्रवास को 14 दिनों तक बढ़ा दिया। वह कौसानी के एक स्थानीय चाय बागान मालिक के न्यौते पर यहाँ रुके थे। आज करीब 92 साल बाद अनासक्ति आश्रम वहां है, जहां वे रहे थे। यह आश्रम उनकी स्मृति को अपने विशेष तरीके से जीवित रखे है। हिमालय में बसे इस आश्रम में हर आगंतुक गांधी के जीवन का पालन करते हुए गांधी के रूप में रहता है। यहां महात्मा की यादें अभी भी कायम हैं। उनके जीवन के साथ-साथ उनसे जुड़े यादगार अंश हर नुक्कड़ और कोने में देखे जा सकते हैं।



कुछ ऐसे हुआ आश्रम का नामकरण
आश्रम का नाम अनासक्ति रखा गया। जिसका अर्थ है कार्यों के परिणामों से अलगाव। क्योंकि गांधी ने कौसानी ने अपना अधिकांश समय भगवद्गीता के केंद्रीय दर्शन को समाहित करने वाले श्लोकों के अनुवाद पर व्यतीत किया था। गीता में मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग का अनुवाद किया था। बापू ने यहां रहकर जो किताब लिखी थी, उसका नाम अनासक्ति योग रखा था। लिहाजा, इस आश्रम का नाम भी अनासक्ति आश्रम रखा गया है। यहां रहने वाले अपने शौचालय की सफाई करते हैं। प्रार्थना, ध्यान और अनासक्ति योग के बारे में सीखने से लेकर प्रकृति की शांति का आनंद लेने का श्रेष्ठ स्थान है। सात्विक भोजन करने के अलावा यहां रहने वाले मेहमान आश्रम में निवास के दौरान गांधी दर्शन के सभी पहलुओं का आनंद ले सकते हैं।



अब आश्रम में नया रूप ले लिया है
जब मैं करीब 6 वर्ष पहले अनासक्ति योग आश्रम में पहली बार आया था तो पूरा परिसर अपने मूल स्वरूप में था। मतलब, इसे जैसा बापू के लिए बनाया गया था, ठीक वैसी स्थिति में संजोकर रखा गया था। हालांकि, लंबा वक्त बीत जाने के कारण मुख्य इमारत और सहायक इमारतें जर्जर हो चली थीं। इस बार आश्रम का कायाकल्प हो चुका है। पूरे आश्रम ने नया स्वरूप ले लिया है। भवन के सामने एक गांधी प्रतिमा है। गांधी के तीन बंदरों की मूर्तियां हैं। उनकी तीन कहावतों के साथ कोई बुरी बात मत कहो, कोई बुराई नहीं सुनो और कोई बुराई मत देखो, प्रवेश द्वार पर मेहमानों का स्वागत करते हैं। दीवारों को उनके जीवन की घटनाओं के चित्रण से सजाया गया है। जहां एक दीवार गांधी के जीवन इतिहास से सजी है। दूसरी दीवार उनके वंश को दर्शाती है। परिसर की प्रत्येक दीवार पर महात्मा गांधी की कोई न कोई शिक्षा है।



महात्मा गांधी का अनुभव साझा करता है आश्रम
जब महात्मा गांधी यहां रहे थे तो उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए लेख लिखा था। अपने कई साथियों को यहाँ से पत्र भेजे थे। वह लेख आश्रम की एक दीवार पर लिखे गए हैं। जिसमें वह बताते हैं कि वह इस जगह से कितने मंत्रमुग्ध हैं। कैसे उन्होंने अपने प्रवास के दौरान भगवद्गीता से अनासक्ति योग का अनुवाद किया। देश की आजादी के लिए अपने प्रवास के दौरान काम को बढ़ाने की कैसे योजना बनाई है? आपको याद दिला दें कि यह प्रवास देश की आजादी से करीब 18 साल पहले महात्मा गांधी ने किया था। उस वक्त स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था। महात्मा गांधी 2 तरह से इस संघर्ष को आगे बढ़ा रहे थे। एक तरफ उनके आंदोलन का उद्देश्य अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति की खिलाफत करना था। दूसरी ओर भारतीय समाज में छुआछूत, भेदभाव, नारी का शोषण और अशिक्षा को समाप्त करना था।



बापू ने कौसानी से अपने बेटे-बहू को लिखी थी चिट्ठी
कौसानी प्रवास के दौरान बापू ने अपने बेटे-बहू मणिलाल और सुशीला को लिखे एक पत्र में लिखा है, “मैं आपको हिमालय से बर्फ से नहाए हुए पहाड़ को देखते हुए लिख रहा हूं। मैं सारा दिन बालकनी में बैठकर गीता के श्लोकों का अनुवाद करते हुए बिताता हूं।" इस आश्रम के 25 कमरों के अलावा एक प्रार्थना और ध्यान कक्ष है, जो आश्रम के निवासियों के लिए प्रतिदिन खुलता है। यहां रहने वालों को अनिवार्य रूप से प्रार्थना सभा में सम्मिलित होना होता है। गांधी के जीवन और कार्यों को समर्पित एक पुस्तकालय और एक शोध केंद्र परिसर का हिस्सा हैं। गांधी पर और उनकी किताबों के अलावा, पुस्तकालय में कृषि और विनोबा भावे के कार्यों पर किताबें भी शामिल हैं। आश्रम के प्रबंधक रमेश चंद्र पांडे ने कहा, "जिस घर में बापू ठहरे थे, वह कई सालों तक गेस्टहाउस बना रहा। फिर इसे एक डाक बंगले में बदल दिया गया। जब सुचेता कृपलानी 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो महात्मा गांधी की स्मृति को संरक्षित करने के लिए यह परिसर उत्तर प्रदेश गांधी स्मारक निधि को दान कर दिया।" 



बापू के मुताबिक क्या है अनासक्ति का मतलब
रमेश पांडे ने कहा, "अनासक्ति योग श्रीमद्भगवद्गीता के एक अंश का अनुवाद है, जो स्वयं के कर्मों के फल से अनासक्त जीवन, परिणाम के प्रति आसक्त हुए बिना समर्पित कर्म और कर्म का जीवन बताता है।" महात्मा गांधी की यादगार यात्रा के बाद से दुनिया भले ही काफी बदल गई हो, लेकिन आश्रम से दिखाई देने वाली त्रिशूल, नंदा देवी और पंचाचुली पर्वत श्रृंखलाएं वहीं अडिग खड़ी हैं। इन्हें देखकर ही बापू रोमांचित हुए थे। जब धूप खिलती है और मौसम साफ होता है तो आश्रम से यह पर्वत श्रंखलाएं सामान्य रूप से देखी जा सकती हैं। कोहरे और बादल भरे मौसम के दौरान इन पर्वत श्रृंखलाओं को देखने के लिए आश्रम में टेलिस्कोप भी उपलब्ध है।



लेकिन कौसानी में केवल गांधी आश्रम ही नहीं है
वर्ष 2013 में गांधी जी की सहयोगी सरला बेन को समर्पित एक संग्रहालय आश्रम के पास बनाया गया है। इंग्लैंड की निवासी कैथरीन मैरी हेलमैन को महात्मा गांधी ने सरला बेन नाम दिया था। उन्होंने अपना जीवन भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित कर दिया था। आजादी के बाद वह अल्मोड़ा में रहने लगी थीं। बापू के प्रेरणा को आगे बढ़ाने के लिए कौसानी और आसपास के देहात में काम किया। वर्ष 1942 में उन्होंने कौसानी में लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की थी। जिसे उस समय कस्तूरबा महिला उत्थान मंडल के नाम से जाना जाता था। महिलाओं के उत्थान के लिए वर्षों तक समर्पित कार्य करने के बाद 1982 में उनका निधन हो गया।



कोरोना संक्रमण ने आश्रम की गतिविधियों को बाधित किया
आज 2 अक्टूबर को हम महात्मा गांधी की 152वीं जयंती मना रहे हैं। पिछले 2 वर्षों से पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी की चपेट में है। जिसका सीधा असर अनासक्ति आश्रम की गतिविधियों पर भी पड़ा है। कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए आश्रम में नियमित सुबह-शाम होने वाली प्रार्थना सभाएं स्थगित हैं। आज बापू की जयंती पर भी बड़ा कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया है। प्रबंधन समिति और शहर के कुछ चुनिंदा लोग कार्यक्रम में शामिल हुए। दिन निकलने से पहले पूरे कौसानी कस्बे में प्रभात फेरी आयोजित की गई। आश्रम परिसर में ध्वजारोहण किया गया है। इसके बाद आश्रम में लगी बापू की प्रतिमा पर माल्यार्पण हुआ। कस्बे के बुजुर्गों ने उनके दिखाए रास्ते पर चलने के लिए युवा पीढ़ी से अपील की।

आश्रम की देखभाल टीम के सदस्य राजेन्द्र राणा ने कहा, "आश्रम में कोरोना महामारी के कारण आयोजन सीमित कर दिए हैं। स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम और ड्राइंग प्रतियोगिता इस बार नहीं हुई हैं। पिछले 2 वर्षों से आश्रम में आने वाले पर्यटकों और गांधी अनुयायियों की संख्या भी बेहद कम रह गई है।"

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