मां दुर्गा के इस रूप का दर्शन केवल शीशे से सम्भव है, पीठ की ओर से होती है पूजा, बड़ी खास वजह है

उत्तराखंड की यात्रा : मां दुर्गा के इस रूप का दर्शन केवल शीशे से सम्भव है, पीठ की ओर से होती है पूजा, बड़ी खास वजह है

मां दुर्गा के इस रूप का दर्शन केवल शीशे से सम्भव है, पीठ की ओर से होती है पूजा, बड़ी खास वजह है

Tricity Today | कोट भ्रामरी देवी

मां दुर्गा के इस रूप का दर्शन केवल शीशे से सम्भव है, पीठ की ओर से होती है पूजा, बड़ी खास वजह है A visit to Uttrakhand : उत्तराखंड का कुमाऊँ मंडल सौंदर्य के मामले में पहाड़ों में सर्वोपरि है। उससे भी कहीं ज्यादा आकर्षक कुमाऊं के धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं। इन्हीं में से एक बागेश्वर जिले में कोट भ्रामरी देवी का मंदिर है। यह मां दुर्गा का शक्तिपीठ है, जहां भंवरे के रूप में मां दुर्गा विराजमान हैं। खास बात यह है कि मां शक्ति के इस रूप के दर्शन सीधे तौर पर संभव नहीं हैं। कोट भ्रामरी देवी के मंदिर में मां दुर्गा श्रद्धालुओं की तरफ पीठ करके विराजमान हैं। दर्पण के माध्यम से ही माता के दर्शन संभव होते हैं। प्रत्येक 12 वर्षों में केवल एक बार इस शक्तिपीठ पर मां भ्रामरी देवी के सीधे दर्शन किए जाते हैं।

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की कत्यूर घाटी के बीचोंबीच मां कोट भ्रामरी देवी का मंदिर है। यह शक्तिपीठ है श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। इसका पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है। मां नंदा सुनंदा के इस धार्मिक केंद्र में हर साल चैत्राष्टमी को विशाल मेला लगता है। इस दौरान श्रद्धालुओं की तरफ से विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।



कोट भ्रामरी देवी शक्तिपीठ के महंत नवीन चन्द्र तिवारी ने कहा, "2500 ईसा पूर्व से लेकर 700 ईस्वी तक कमाऊं पर कत्यूरी राजवंश का शासन था। इसी दौरान कत्यूर घाटी में एक किला स्थापित किया गया था। यहीं मां भगवती मंदिर है। जिसमें मां नंदा देवी की मूर्ति स्थापित है। जन श्रुतियों के अनुसार कत्यूरी राजाओं और चंद वंशावलियों की कुलदेवी भ्रामरी और प्रतिस्थापित नंदा देवी हैं। कत्यूरी राजवंश पूजा-अर्चना इस मंदिर में करता था। मंदिर में भ्रामरी रूप में देवी की पूजा अर्चना की जाती है। भ्रामरी रूप में मां दुर्गा मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि मूल शक्ति के रूप में हैं।"

इन मंदिरों में दर्शन से पूरी होती हैं मन्नत, मिलता है मां दुर्गा का आशीर्वाद : नवीन चन्द्र तिवारी के पूर्वज मंदिर स्थापना से निरंतर यहां पूजा अर्चना कर रहे हैं। वह बताते हैं कि नंदा के रूप में इस स्थल पर मूर्ति पूजन, डोला स्थापना और विसर्जन का प्रावधान है। यहां पर चैत्राष्टमी और भादो मास की अष्टमी को मेला लगता है। तब दूर-दराज से श्रद्धालु मां की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। मन्नतें मांगते हैं। जब ये पूरी हो जाती हैं तो दोबारा पूजा अर्चना के लिए आते हैं। मां के प्रति आस्था व्यक्त करने के लिए लोग मंदिर परिसर में घंटे बांधकर जाते हैं। ऐसे हजारों घंटे मंदिर परिसर में देखे जा सकते हैं।



नवीन चंद्र तिवारी ने कहा, "यहां भगवती मां भ्रामरी देवी का मेला चैत्र मास की शुक्ल अष्टमी को आयोजित होता है। जबकि मां नंदा का मेला भाद्र मास की शुक्ल अष्टमी को लगता है। कहते हैं कि मां नंदा की प्रतिमा पहले यहां से करीब आधा किलोमीटर दूर झालामाली नामक गांव में स्थापित थी। देवी मां की प्रेरणा से पुजारियों ने कोट भ्रामरी मंदिर में ही नन्दा देवी की भी प्राण प्रतिष्ठा कर दी थी। तभी से दोनों महाशक्तियों की पूजा यहां होने लगी है।

कोट भ्रामरी माता के मंदिर का एक रहस्य है, जिसका अब तक खुलासा नहीं हुआ : माता कोट भ्रामरी के मंदिर का निर्माण कब और किसने किया, यह आज तक रहस्य ही है। प्रसिद्ध कवियों, साहित्यकारों, लेखकों ने अपने-अपने शब्दों से इस दिव्य दरबार की महिमा का बखान किया है। प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद रचित ‘ध्रुव स्वामिनी’ नाटक ग्रंथ में चंद्रगुप्त का अपनी सेना की टुकड़ी के साथ इस क्षेत्र में रुकने का उल्लेख मिलता है। महंत नवीन चंद्र तिवारी बताते हैं कि गीता और रामायण की तरह हिंदू धर्म में सबसे पवित्र पुस्तक दुर्गा सप्तशती मानी जाती है। दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय में मां भ्रामरी देवी का विस्तृत उल्लेख है।



उन्होंने बताया, मां भ्रामरी देवी के साथ पौराणिक दैत्य अरुण राक्षस और शुंभ-निशुंभ के संहार की कथा जुड़ी है। इस घाटी में विशाल जलाशय था। जिससे अरुण नामक अत्याचारी राक्षस अपने राज्य में प्रवेश करता था। उसे वरदान था कि वह न तो किसी देवता, न ही किसी मनुष्य, न ही किसी शस्त्र से मारा जा सकता था। देवताओं और मनुष्यों की आराधना पर आकाशवाणी हुई कि इस महादैत्य के संहार के लिए वैष्णवी का अवतरण होगा। महामाया जगत जननी के अलौकिक प्रताप से समूचा आकाशमंडल भ्रमरों (भंवरों) से गुंजायमान होकर डोल उठा। भगवती के भ्रामरी रूप ने अरुण नामक महादैत्य का अंत किया।

मां ने ली केले के पेड़ की ओट : मां नंदा ने दुर्गा का रूप धारण कर महिषासुर का वध किया था। यह भगवती इस दैत्य को थकाने के लिए गांव मवाई (जो तब जंगल हुआ करता था) में केले के पेड़ की ओट में छिप गई थीं। तभी से नंदा देवी की पूजा केले के पेड़ के रूप में की जाती है।

भ्रामरी देवी के दर्शन शीशे के जरिए करने को लेकर स्थानीय निवासियों में मिथक है : कोट भ्रामरी देवी का मंदिर अल्मोड़ा-कौसानी-गरुड़-बागेश्वर मार्ग पर पड़ता है। बैजनाथ से लगभग 4 किमी दूर भगवती माता कोट भ्रामरी देवी का मंदिर है। बैजनाथ और गरुड़ कस्बों में पर्यटकों के ठहरने के लिए अच्छे होटल उपलब्ध हैं। स्थानीय लोगों के बीच व्यापक मान्यता है कि देवी कोट भ्रामरी मंदिर के पुजारी को छोड़कर किसी को भी देवी का चेहरा नहीं दिखाया जाना चाहिए। मंदिर के पुजारी नवीन चंद्र तिवारी ने बताया कि शीशे के माध्यम से ही माता के दर्शन संभव हैं।



श्रद्धालुओं के लिए माता की प्रतिमा पीठ की ओर से स्थापित की गई है। अगर इस सलाह का पालन नहीं किया गया तो पूरी कत्यूर घाटी बीमार हो जाएगी। बड़े पैमाने पर आपदा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए देवी की पीठ की ओर से पूजा की जाती है। सितंबर महीने के दौरान भाद्रपद अष्टमी या राधा अष्टमी के दौरान "नंदाष्टमी" के वार्षिक उत्सव को छोड़कर माता के सीधे दर्शन करना वर्जित है। यहां 12 वर्षों में एक बार राज जात यात्रा होती है। पहले नंदाष्टमी के मौके पर भैंस और मेमने की बलि दी जाती थी। पशु संरक्षण समिति ने एक जनहित याचिका नैनीताल उच्च न्यायालय में दायर की थी। हाईकोर्ट ने पशु बलि पर रोक लगा दी है। परिणामस्वरूप यह प्रथा बंद हो गई है।

चार मठों की स्थापना के दौरान इस मंदिर पर ठहरे थे आदि गुरु शंकराचार्य
यहां के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि लगभग 200 साल पहले नेपाली आक्रमण से राज्य को बचाने के लिए माँ नंदादेवी की मूर्ति को भी कोट भ्रामरी मंदिर में स्थापित किया गया था। जिसके परिणामस्वरूप लगभग 200 साल पहले पशु बलि शुरू हो गई थी। मंदिर परिसर में पूजा पाठ का सामान उपलब्ध कराने के लिए दुकान चलाने वाले फुलवारी गांव के राजेंद्र सिंह ने बताया कि यह भी एक मिथक है कि आदिगुरु शंकराचार्य बद्रीनाथ जाते समय इस मंदिर में रातभर रुके थे। उस वक्त आदि गुरु शंकराचार्य हिंदू धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए पूरे भारतवर्ष की यात्रा पर थे। तभी उन्होंने उत्तर मठ की स्थापना की थी।

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