सहारनपुर की बेहट सीट से होता है उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद, जानिए कैसे हैं हालात

कौन जीतेगा यूपी : सहारनपुर की बेहट सीट से होता है उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद, जानिए कैसे हैं हालात

सहारनपुर की बेहट सीट से होता है उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद, जानिए कैसे हैं हालात

Tricity Today | सहारनपुर की बेहट सीट

सहारनपुर की बेहट सीट से होता है उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद, जानिए कैसे हैं हालात Uttar Pradesh Vidhansabha Chunav 2022
उत्तर प्रदेश...राजनीतिक रूप से देश का सबसे ताकतवर राज्य!
403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में चुनाव (UP Assembly Election) होगा। एक तरफ मौजूदा योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) सरकार की परीक्षा होगी तो दूसरी तरफ विपक्षी दलों के लिए सत्ता में वापसी करने का मौका है। इस हार-जीत का फैसला आम आदमी करेगा। हम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आम आदमी की नब्ज टटोलने निकले हैं। लोग योगी सरकार के किन कामों से खुश हैं और क्या काम अधूरे रह गए हैं। कौन से काम जनता को पसंद नहीं आए हैं। आने वाले चुनाव को लेकर क्या सोच रहे हैं। विपक्ष विकल्प बन पाएगा या नहीं? मौजूदा विधायक वोटरों का दिल जीत पाए या नहीं?



सहारनपुर से होता है विधानसभा सीटों का निर्धारण
उत्तर प्रदेश में विधानसभा सीटों का निर्धारण सहारनपुर जिले से शुरू होता है। हम भी सबसे पहले सहारनपुर से शुरुआत करेंगे। वेस्ट यूपी में तीन मंडलों के 14 जिले हैं। इनमें सहारनपुर मण्डल के मुजफ्फरनगर, शामली और सहारनपुर जिले हैं। मेरठ मंडल में गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, बुलंदशहर, हापुड़, बागपत और मेरठ हैं। इसी तरह मुरादाबाद मंडल के बिजनौर, रामपुर, अमरोहा, संभल और मुरादाबाद जिले हैं।

वेस्ट यूपी में 70 सीटें, 50 भाजपा के विधायक
इन 14 जिलों में 70 विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें से 50 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं। समाजवादी पार्टी के 13, बहुजन समाज पार्टी के 4, कांग्रेस के 2, राष्ट्रीय लोकदल का एक विधायक है। हम आज सहारनपुर से यह सफरनामा शुरू करने जा रहे हैं। सहारनपुर में बेहट, नकुड़, गंगोह, रामपुर मनिहारान, देवबंद, सहारनपुर नगर और सहारनपुर देहात सीट हैं। इनमें से 4 पर भाजपा, दो पर कांग्रेस और एक सीट पर समाजवादी पार्टी काबिज है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की शुरुआत वेस्ट यूपी से होती है। सहारनपुर जिले में बेहट विधानसभा क्षेत्र नम्बर एक असेम्बली सीट है। यूपी का चुनाव हो और जाति-बिरादरी या धर्म के आधार समीकरण तय ना हों, ऐसा नामुमकिन है। बेहट यूपी की उन चुनिंदा सीटों में से एक है, जहां मुसलमान निर्णायक हैं। इस सीट पर 52 फीसदी मुसलमान वोटर हैं। बाकी 48 फीसदी हिन्दू वोटरों में दलित दूसरे और अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल सैनी तीसरे नम्बर की आबादी हैं। ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और गुर्जर की मौजूदगी है, लेकिन हार-जीत तय करने की स्थिति में नहीं हैं।



बेहट में अभी कांग्रेस के विधायक नरेश सैनी हैं
बेहट विधानसभा सीट पर अभी कांग्रेस का कब्जा है। कांग्रेस के नरेश सैनी यहां से विधायक हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में नरेश सैनी ने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी महावीर सिंह राणा को करीब 30,000 मतों से पराजित किया था। खास बात यह थी कि महावीर सिंह राणा पहले बहुजन समाज पार्टी में थे। उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बसपा को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा था। अगर वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो तब भी महावीर सिंह राणा और नरेश सैनी के बीच रोचक मुकाबला हुआ था। उस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर महावीर सिंह राणा ने महज 516 वोटों से नरेश सैनी को शिकस्त दी थी। इस सीट की खास बात यह है कि वैसे तो सैनी समुदाय जिले में भारतीय जनता पार्टी के साथ है, लेकिन बेहट विधानसभा क्षेत्र पर यह समुदाय सजातीय प्रत्याशी नरेश सैनी को समर्थन करता है।

सैनी समुदाय के गांव मुर्तजापुर और दयालपुर में लोगों ने खुलकर यह बात कही। पूर्व प्रधान रवि सैनी ने कहा, "हम लोग मौजूदा विधायक नरेश सैनी के साथ हैं। एक तरह से आप हमें नरेशवादी कह सकते हैं, लेकिन हम दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार चाहते हैं। दरअसल, योगी सरकार ने कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर शानदार काम किया है। एक वक्त था जब मर्दों को भी घर से निकलते हुए डर लगता था। बहन-बेटी तो दिन छिपने के बाद इलाके में घूम नहीं सकती थीं। अब हम लोग खुले कि वार्ड सो सकते हैं।" दयालपुर गांव में भी लोगों ने यही बात दोहराई है। हालांकि, ग्रामीणों ने यह भी कहा कि अगर नरेश सैनी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाएं तो उनके लिए विकल्पों को चुनना बेहद आसान हो जाएगा।



सीट पर मुस्लिम वोटर 52%, पूरी तरह निर्णायक
बेहट विधानसभा क्षेत्र उत्तर प्रदेश के उन चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बहुत ज्यादा है। बेहट पर करीब 52% मुस्लिम मतदाता हैं। लिहाजा, सीट का परिणाम पूरी तरह से मुसलमान वोटरों के हाथ में है। कुल मिलाकर इस सीट का समीकरण कुछ इस तरह है। अगर मौजूदा विधायक नरेश सैनी और इमरान मसूद मिलकर चुनाव लड़े तो यहां कांग्रेस कामयाबी दोहरा सकती है। पूरे इलाके में एक चर्चा है कि इमरान मसूद खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं। ऐसे में नरेश सैनी को नया ठिकाना ढूंढना पड़ सकता है। भाजपा से पूर्व विधायक महावीर सिंह राणा के बेटे अभय राणा दावेदारी कर रहे हैं। बसपा हल्की पड़ रही है। आम आदमी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और एआईएमआईएम ने भी यहां चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। इस सीट पर कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है।

इमरान फेक्टर पूरे निर्वाचन क्षेत्र में मौजूद
कांग्रेस के नेता इमरान मसूद का दबदबा पूरे निर्वाचन क्षेत्र में एक तरफा देखने को मिलता है। यह प्रभाव केवल मुस्लिम मतदाताओं में नहीं बल्कि हिंदू वोटरों में भी साफ नजर आया। दोनों ही समुदाय के लोगों ने साफ कहा कि इमरान मसूद सहारनपुर में एक तरह से शीर्ष नेता हैं। इमरान मसूद की दूसरी खासियत यह है कि वह संप्रदाय देखे बिना लोगों की मदद करते हैं, लेकिन मौजूदा ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते उन्हें हार का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर सहारनपुर में चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि अगर इमरान मसूद बेहट सीट से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे तो वह लगभग अपराजेय रहेंगे। उनके खिलाफ ध्रुवीकरण का लाभ भी भारतीय जनता पार्टी को यहां नहीं मिल पाएगा। दरअसल, पिछले विधानसभा चुनाव में इमरान मसूद ने नकुड़ से चुनाव लड़ा था और ध्रुवीकरण का सीधा फायदा बसपा छोड़कर भाजपा में आए राज्य सरकार के मंत्री धर्म सिंह सैनी को मिल गया था। बेहट सीट पर मुस्लिम वोटरों की संख्या 52 फीसदी है। लिहाजा, ध्रुवीकरण का भाजपा को लाभ मिलना नितांत मुश्किल है।

गन्ना भुगतान नहीं होना मुद्दा, किसान आंदोलन बेअसर
बेहट विधानसभा क्षेत्र में गुर्जर, सैनी और मुसलमान गुर्जर बड़े काश्तकार हैं। खेती किसानी का काम इन्हीं बिरादरी के पास है। मुख्य रूप से इस इलाके में गन्ना, गेहूं और धान की उपज लेने वाले किसान हैं। गन्ना भुगतान इलाके में सबसे बड़ा मुद्दा है। ताजपुरा, बेहट, मिर्जापुर पोल, जाटोंवाला, मुर्तजापुर और दयालपुर में सभी किसानों ने यह मुद्दा उठाया। किसानों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 14 दिनों में गन्ना मूल्य दिलाने का वायदा किया था, लेकिन 14 महीनों का बैकलॉग चल रहा है। गेहूं खरीद अच्छी हुई। वक्त पर पैसा भी मिल गया, लेकिन धान खरीद सरकार नहीं कर रही है। जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। बिजली के बिलों की कड़ाई से वसूली पर भी किसानों में नाराजगी है। किसानों का कहना है कि जब हमें गन्ने का पैसा वक्त पर सरकार नहीं देती तो हम वक्त पर बिजली का बिल कैसे चुका दें? दूसरी ओर भारतीय किसान यूनियन और राकेश टिकैत के आंदोलन का कोई असर इस इलाके में नजर नहीं आता है। यहां के किसानों का साफ तौर पर कहना है कि जिन लोगों को काम है, वह दिल्ली बॉर्डर पर जाकर आंदोलन नहीं कर सकते हैं। जो लोग दिल्ली बॉर्डर पर बैठकर आंदोलन कर रहे हैं, उन्हें किसान माननीय से इन लोगों ने भी इंकार कर दिया।



मैंने विपक्ष में होने के बावजूद विकास कार्य करवाए: नरेश सैनी
बेहट विधायक नरेश सैनी ने कहा, "मैं विपक्ष का विधायक हूं, उसके बावजूद तमाम बड़े काम और विकास कार्य अपने इलाके में करवाए हैं। मेरा पूरा विधानसभा क्षेत्र शिवालिक पहाड़ियों के नीचे है। यहां सर्दी गर्मी और बरसात में भारी आपदाओं का सामना करना पड़ता है। इस इलाके में आगजनी रोकने के लिए कोई फायर स्टेशन नहीं था। मैंने विधानसभा में इसकी मांग की। सब स्टेशन का निर्माण शुरू हो गया है। करीब 50 वर्षों से शाहपुर और आसपास के गांव वाले नदी पर पुल की मांग कर रहे थे। इस पुल का निर्माण शुरू करवाया है। मैंने 50 से ज्यादा गांवों में तटबंध और रपटों का निर्माण करवाया है। मैं अपनी शत-प्रतिशत विधायक निधि विकास कार्यों पर खर्च कर चुका हूं। विपक्ष में होने के बावजूद मुझे उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई मंत्री और हमारे उपमुख्यमंत्री ने भरपूर सहयोग दिया है। इसके लिए मैं उनका आभारी हूं।"

वर्ष 2008 में बनी यह सीट, 2012 में पहला चुनाव हुआ
बेहट विधानसभा क्षेत्र वर्ष 2008 में नए परिसीमन के तहत गठित किया गया है। इस पर पहली बार वर्ष 2012 में विधानसभा चुनाव करवाया गया। दूसरी बार वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव करवाया गया था। अब यहां तीसरा विधानसभा चुनाव होगा। खास बात यह है कि दोनों विधानसभा चुनाव में अलग-अलग विधायक जनता ने चुने हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में जहां बहुजन समाज पार्टी के महावीर सिंह राणा ने जीत हासिल की थी, वहीं वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस के नरेश सैनी विजय हुए थे। बड़ी बात यह रही थी कि महावीर सिंह राणा दलबदल करके बसपा से भाजपा में आए थे, इसके बावजूद जनता ने उन्हें नकार दिया था। दोनों ही चुनाव में मुकाबला महावीर सिंह राणा और नरेश सैनी के बीच हुआ था। आने वाले विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों की स्थिति अभी साफ नहीं है। सहारनपुर के चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि मतदाताओं को अगले साल होने वाले चुनावों में नए उम्मीदवारों का आंकलन करना पड़ सकता है। दरअसल, कांग्रेस से इमरान मसूद, भारतीय जनता पार्टी से अभय प्रताप सिंह और समाजवादी पार्टी से भी कोई नया चेहरा मैदान में आ सकता है।

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