राजनीतिक उठापटक: 20 वर्ष के उत्तराखंड ने देखे तमाम उलटफेर, पढ़ें पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से रावत तक का सफरनामा

20 वर्ष के उत्तराखंड ने देखे तमाम उलटफेर, पढ़ें पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से रावत तक का सफरनामा

Google Image | Trivendra Singh Rawat

  • 9 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग उत्तराखंड राज्य बना
  • पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी बने
  • नारायण दत्त तिवारी ने पूरा किया 5 साल का कार्यकाल
  • कार्यकाल पूरा किए बिना कुर्सी गंवाने वाले सीएम की लिस्ट में त्रिवेंद्र सिंह रावत आठवें स्थान पर हैं
पांच साल का कार्यकाल पूरा किए बिना ही त्रिवेंद्र सिंह रावत को मंगलवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके साथ ही वह मुख्यमंत्रियों की एक खास सूची में शामिल हो गए हैं। उत्तराखंड राज्य के 20 वर्ष के इतिहास में 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किए बिना कुर्सी गंवाने वाले चीफ मिनिस्टर्स की लिस्ट में त्रिवेंद्र सिंह रावत आठवें स्थान पर हैं। रावत ने 18 मार्च, 2017 को राज्य के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाला था। सिर्फ 9 दिन बाद ही वह अपनी सरकार के चार साल पूरे करने वाले थे। मगर उससे पहले मंगलवार को ही उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। 

सिर्फ नारायण दत्त तिवारी पूरा कर सके कार्यकाल
उत्तराखंड राज्य में पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया के रूप में 2002 में कमान संभालने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी एकलौते ऐसे मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। 9 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग उत्तराखंड राज्य बनाया गया। इसके पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी बने, लेकिन वह कोई कमाल नहीं कर सके। महज एक साल में ही उन्हें लेकर प्रदेश भाजपा में असंतोष चरम पर पहुंच गया। मजबूरन पार्टी आलाकमान ने उन्हें हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को सूबे की कमान सौंप दी। 

चुनाव के बाद फिर कांग्रेस को मिली कमान
मगर फरवरी, 2002 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा को शिकस्त मिली और कोश्यारी भी सत्ता से बाहर हो गए। उसके बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में भी उन्हें हटाए जाने से संबंधित चर्चाएं चलती रहीं। लेकिन उनके कद और अनुभव के सामने उनके विरोधियों की इच्छाएं कभी परवान नहीं चढ सकीं। उन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। वर्ष 2007 में कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद ही वह मुख्यमंत्री पद से हटे।

भाजपा ने पूर्व फौजी खंडूरी को सौंपी जिम्मेदारी
उसके बाद सत्ता में आई भाजपा ने रिटॉयर्ड फौजी भुवनचंद्र खंडूरी को चेहरा बनाकर भरोसा जताया। लेकिन वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने बढ़त हासिल की और प्रदेश की सभी पांचों सीटों पर कब्जा कर लिया। इससे क्षुब्ध होकर भुवनचंद्र खंडूरी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह मुख्यमंत्री बने वर्तमान केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। साल 2012 के विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले भुवनचंद्र खंडूरी को फिर से मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। 

हरीश रावत भी जीत नहीं दिला सके
लेकिन विधानसभा चुनाव में हार के बाद उनकी कुर्सी पर कांग्रेस का कब्जा हो गया। साल 2012 के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर सत्ता में आई कांग्रेस ने विजय बहुगुणा पर दांव खेला। लेकिन 2013 की केदारनाथ आपदा उनके राजनीतिक भविष्य के लिए विनाशकारी साबित हुई। बहुगुणा को हटाकर कांग्रेस ने हरीश रावत को प्रदेश की कमान सौंपी। हांलांकि, वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद हरीश रावत को भी गद्दी छोड़नी पड़ी। उनके बाद मुख्यमंत्री बने त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार, 9 मार्च को अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया है।

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